Image of a wheelchair user in workshop with participants around her

समावेशी नारीवाद: जब तक सब आज़ाद नहीं, कोई आज़ाद नहीं

क्या हमारा नारीवाद वास्तव में समावेशी है? फ़्लम्बारी हिंदी 2026 में आयोजित 'नारीवाद और विकलांगता न्याय' कार्यशाला के माध्यम से हमने समझा कि समानता का अर्थ केवल एक जैसा व्यवहार नहीं, बल्कि हर महिला की शारीरिक विशिष्टता और सुगम्यता (Accessibility) को ध्यान में रखना है। डॉ. आभा खेतरपाल द्वारा संचालित इस सत्र में ४५ ज़मीनी कार्यकर्ताओं ने अपनी अपेक्षाओं और भयों को साझा किया, यह स्पष्ट करते हुए कि नारीवाद तब तक अधूरा है जब तक इसमें विविधता और एजेंसी (स्वयं निर्णय लेने की शक्ति) को प्रमुख स्थान नहीं मिलता। आइए, बाधाओं को पहचानें और एक ऐसी दुनिया की नींव रखें जहाँ हर आवाज़ सुनी जाए और हर स्थान सुगम हो।
Minimalist illustration of a black wheelchair on a beige background with a Hindi quote below that reads: 'सम्मान शब्दों से नहीं, दृष्टिकोण से आता है।' (Respect comes not from words, but from perspective.)

क्या ‘स्पेशल’ कहना सच में विकलांगता को सम्मान देता है?

भाषा का जादू या जाल? जब किसी को 'स्पेशल' कहा जाता है, तो यह सुनने में मधुर लगता है। लेकिन क्या यह वास्तव में सम्मानजनक है? या फिर यह शब्द…
Two people smiling and laughing and talking. A man on wheelchair and girl kneeling down in front of him. Both seem to be happy with each other.

सेक्स, और विकलांगता: चुप्पी तोड़िए; सवाल पूछिए

भारत में जब विकलांगता की बात होती है, तो ज़्यादातर बातें व्हीलचेयर, पेंशन योजना, या एक्सेसिबल रैंप तक ही सीमित रह जाती हैं। लेकिन एक बड़ा और लगभग पूरी तरह…