Posted inअनुभूति
समावेशी नारीवाद: जब तक सब आज़ाद नहीं, कोई आज़ाद नहीं
क्या हमारा नारीवाद वास्तव में समावेशी है? फ़्लम्बारी हिंदी 2026 में आयोजित 'नारीवाद और विकलांगता न्याय' कार्यशाला के माध्यम से हमने समझा कि समानता का अर्थ केवल एक जैसा व्यवहार नहीं, बल्कि हर महिला की शारीरिक विशिष्टता और सुगम्यता (Accessibility) को ध्यान में रखना है। डॉ. आभा खेतरपाल द्वारा संचालित इस सत्र में ४५ ज़मीनी कार्यकर्ताओं ने अपनी अपेक्षाओं और भयों को साझा किया, यह स्पष्ट करते हुए कि नारीवाद तब तक अधूरा है जब तक इसमें विविधता और एजेंसी (स्वयं निर्णय लेने की शक्ति) को प्रमुख स्थान नहीं मिलता। आइए, बाधाओं को पहचानें और एक ऐसी दुनिया की नींव रखें जहाँ हर आवाज़ सुनी जाए और हर स्थान सुगम हो।
