“नारीवाद का अर्थ केवल पुरुषों के बराबर खड़ा होना नहीं है, बल्कि उस हर बाधा को तोड़ना है जो एक महिला को उसकी पहचान की वजह से पीछे धकेलती है।”
हाल ही में ‘फ़्लम्बारी हिंदी 2026’ (Flmbari Hindi 2026) के दौरान एक बेहद प्रभावशाली वर्कशॉप में शामिल होने का मौका मिला, जिसका विषय था— नारीवाद और विकलांगता न्याय (Feminism and Disability Justice)। मैंने इस सत्र का संचालन किया। इस चर्चा ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया: क्या हमारा नारीवाद वास्तव में ‘समावेशी’ है?
समावेशी नारीवाद (Inclusive Feminism) क्या है?
अक्सर नारीवाद की चर्चा मुख्यधारा की महिलाओं (जो शायद सामाजिक या आर्थिक रूप से सशक्त हैं) तक सीमित रह जाती है। लेकिन समावेशी नारीवाद वह है जो चौराहे (Intersectionality) पर खड़ा है। यह समझता है कि एक महिला का संघर्ष उसकी जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति और उसकी ‘शारीरिक क्षमता’ से गहराई से जुड़ा होता है।
विकलांगता और नारीवाद का संगम
डॉ. आभा खेतरपाल ने सत्र में बहुत खूबसूरती से समझाया कि Disability Justice और Feminism अलग-अलग नहीं हैं।
- पहुंच (Accessibility): यदि एक नारीवादी कार्यक्रम में रैंप नहीं है या साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर नहीं है, तो वह समावेशी नहीं है।
- एजेंसी (Agency): समाज अक्सर विकलांग महिलाओं को ‘बेचारा’ या ‘आश्रित’ मान लेता है। समावेशी नारीवाद उन्हें अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेने का अधिकार और सम्मान देता है।
वर्कशॉप की कुछ झलकियाँ
वर्कशॉप के दौरान दीवारों पर लगे ‘Sticky Notes’ केवल कागज़ के टुकड़े नहीं थे, बल्कि वे महिलाओं की अपेक्षाओं, डरों और उनकी आवाज़ों का प्रतिबिंब थे। चर्चा में यह बात निकलकर आई कि:
- हमें अपनी सोच से ‘एबलइज्म’ (Ableism – केवल स्वस्थ शरीर को ही सामान्य मानना) को हटाना होगा।
- नीतियां बनाते समय विकलांग महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए।
- समानता का मतलब केवल ‘एक जैसा व्यवहार’ नहीं, बल्कि ‘ज़रूरत के अनुसार संसाधन’ देना है।
हम क्या कर सकते हैं?
- सुनना शुरू करें: उन महिलाओं की कहानियों को जगह दें जिन्हें अक्सर हाशिए पर रखा जाता है।
- भाषा बदलें: अपनी बातचीत में समावेशी शब्दों का प्रयोग करें।
- स्थान सुरक्षित बनाएं: चाहे वह दफ्तर हो या कोई सामाजिक कार्यक्रम, सुनिश्चित करें कि वह हर किसी के लिए सुलभ (Accessible) हो।
निष्कर्ष
समावेशी नारीवाद का सपना तब तक पूरा नहीं होगा जब तक हम एक-दूसरे के संघर्षों को नहीं समझेंगे। जैसा कि इस वर्कशॉप ने हमें सिखाया— नारीवाद की असली ताकत उसकी विविधता में है। आइए, एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां हर महिला, अपनी हर खूबी और चुनौती के साथ, सर उठाकर जी सके।
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके आस-पास के नारीवादी विमर्श में विकलांग महिलाओं की कितनी भागीदारी है? अपने विचार कमेंट्स में साझा करें।
